दिनों के फेर में लम्हों की किरकिरी देखी…

दिनों का जश्न मनाने का फ़ैशन रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर हावी होने लगा है। आज ये डे है। कल वो डे था। परसों फलां डे था। नरसों के रोज़ तो मैं भूल ही गया था कि कौन सा डे था। काफी सोचने के बाद याद आया कि किसी का बर्थ डे था। ख़ैर आज संडे … Continue reading दिनों के फेर में लम्हों की किरकिरी देखी…

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दिल्ली तेरे अंदाज पर आती है हँसी…

नेताओं के बयानों से मीडिया की मोहब्बत कब छूटेगी, पता नहीं। लेकिन कृषि मंत्री का किसानों की आत्महत्या को लेकर दिया गया बयान, नेताओं की मानसिकता, मीडिया की हक़ीक़त और ज़मीनी वास्तविकता के बारे में बहुत कुछ कहता है। ऐसे बयानों के पीछे कौन सी 'रानजीति' है पढ़िए इस पोस्ट में।

हिंदी में ‘अपनी बात’ कैसे लिखें?

अपनी भाषा में लोगों को सुनने, पढ़ने और लिखने का सुख अद्भुत होता है। लिखने-पढ़ने का लिखने से रिश्ता क्या है? इस पोस्ट में पढ़िए ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब।