थिंक win-win………..

चार कुत्ते एक रोटी  के लिए आपस में मारा-मारी कर रहे थे। काफी देर से वे रोटी के ऊपर उछल रहे थे। एक दूसरे को वे रोटी की परवाह छोड़ काटने और नोचने में मगन थे। जब वे थककर चूर हो गए तो नीचे देखा कि रोटी तो धूल में मिल गई । वे एक … Continue reading थिंक win-win………..

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सफर…अभी जारी है।

सुहाना सफर और ये मौसम हंसी...गीत के बोल याद आ रहे हैं। कल झीलों की नगरी उदयपुर में जाना होगा। स्कूलों में काम करने के अनुभवों पर बात होगी। हमनें स्कूलों में किन बदलावों की नींव रखी। हमने कौन सा देखने लायक परिवर्तन किया। हमनें सैकड़ों घंटे स्कूलों में बिताए हैं। हम उसके बारे में … Continue reading सफर…अभी जारी है।

बाघों की गिनती से हम भी खुश

पर्यावरण मंत्रालय ने बाघों की गिनती के आंकड़े जारी किए। इसके मुताबिक पिछले चार सालों में बाघों की संख्या 1,411 से बढक़र 1,706 हो गई है। जिससे पर्यावरण को लेकर जागरुक हम लोग भी काफी खुश हैं। इन आंकड़ों से यह भी पता चला कि टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश के मुकाबले कनार्टक में बाघों की औसत … Continue reading बाघों की गिनती से हम भी खुश

भोपाल को भोजपाल बनाने की कवायद कितनी सही…

कहां राजा भोज कहां गंगू तेली वाली कहावत भोपाल की वर्तमान स्थिति पर काफी मुफीद बैठती है। राजा भोज को पहचान दिलवाने के लिए गंगू तेली टाइप के लोग काफी सक्रिय हो गए हैं। हम लोगों के बीच विचार-विनिमय से यह बात सामने निकलकर आई कि हमारे देश को दोयम दर्जे के लोग चला रहे … Continue reading भोपाल को भोजपाल बनाने की कवायद कितनी सही…

१९४७ में महिलाओं को आजादी नहीं मिली ?

8 मार्च को विश्व महिला दिवस है। जिसके आने के पूर्व ही महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर होने वाली बहस तेज हो गई है। वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा जी ने अपने एक बयान में कहा कि 1947 में महिलाएं नहीं, पुरुष आजाद हुए थे। उनके इस बयान के क्या मायने हो सकते हैं?क्या देश की … Continue reading १९४७ में महिलाओं को आजादी नहीं मिली ?

भोपाल को भोजपाल बनाने की कवायद कितनी सही ?

कहां राजा कहां गंगू तेली वाली कहावत इन दिनों भोपाल की स्थिति पर ज्यादा मुफीद बैठ रही है। राजा भोज की पहचान के लिए गंगू तेली टाइप के लोग काफी सक्रिय हो गये हैं। इस समय हम लोगों के आपसी विचार-विमर्श से यह निष्कर्ष निकल कर सामने आई, कि हमारे देश को दोयम दर्जे के लोग … Continue reading भोपाल को भोजपाल बनाने की कवायद कितनी सही ?

वेलेंटाइन-वीक की पहली लव स्टोरी

क्लास की चांव-चांव से मेरे आस-पास काफी शोरगुल हो रहा है। किसी काम पर ध्यान केंद्रित करना काफी मुश्किल है। मगर जब कई दिनों की इच्छा जोर मार रही हो तो हमारा वश नहीं चलता। कई दिनों से सोच रहा हूम कि फरवरी के महीने में वेलेंटाइन-डे को लेकर काफी हंगामा होता है, तो क्यों … Continue reading वेलेंटाइन-वीक की पहली लव स्टोरी

वेलेंटाइन-वीक और बसंत ऋतु का एक साथ आगमन

वेलेंटाइन-वीक और बसंत ऋतु का आगमन एक साथ हुआ। यह बात थोड़ी अचरज भरी लग सकती है कि भला वेलेंटाइन वीक और बसंत ऋतु का क्या रिश्ता हो सकता है? दोनों में रिश्ता तलाशना पड़ा, क्योंकि हम जिंदगी और उसकी उत्सव-धर्मिता को अलग-अलग करके नहीं देख सकते।बसंत ऋतु में प्रकृति अपने सौंदर्य के चरम को … Continue reading वेलेंटाइन-वीक और बसंत ऋतु का एक साथ आगमन

सफलता के बाद भी कायम तन्हाई का दर्द

सन 2001 में कमल इरशाद "राही" के लिखे नाटक का रेडियो रुपान्तरण सुना तो हैरान रह गया था। कोई सच्चाई को इतनी आसानी से कैसे कह पाता है?इसी लाइन पर बनी फ़िल्म कोरा कागज़ में रिश्तों की गणित को सुलझाने का काम करते हैं पति-पत्नी. लेकिन रेडियो नाटक की कहानी बहुत हटकर है.जब उस समय … Continue reading सफलता के बाद भी कायम तन्हाई का दर्द

नजर-ए -जिंदगी के अफसाने

आज अपना मन काफी शान्त है। कुछ शान्त चित्त वाली बातों को शब्द देने की इच्छा हो रही है। ईश्वर पर विचार करना पड़ा तो समझ में आया कि लोगो नें ईश्वर को देखने वाली नजर खो दी है। लोग बाग कहां-कहां ढूंढते फिर रहे हैं ईश्वर को?क्या उसका रुप हमारी सहजता व मानवीय व्यवहार … Continue reading नजर-ए -जिंदगी के अफसाने

निकोलाई गोगोल की गरम कोट…

अभी फ्रांसीसी लेखक व कहानीकार निकोलाई गोगोल की कहानियां पढ़ीं। काफी संजीदगी भरा विषय चयन जिसको कल्पनाओं के सहारे दुनिया की तमाम वाहियात रवायतों पर टिप्पणी की गई है। साथ ही सही जिंदगी की मिशाल भी अपने पात्रों और घटनाओं के माध्यम से व्यक्त की है।उनकी पहली कहानी तस्वीर पढ़ी जिसमें एक कलाकार की जिंदगी … Continue reading निकोलाई गोगोल की गरम कोट…

व्यक्तित्व विहीनता का फैलता साम्राज्य

आधुनिक समाज में भौतिक सुख-सुविधाओं में बेहिसाब तरक्की देखने को मिल रही है. लेकिन इसके साथ ही इंसान तमाम तरह की त्रासदियों से गुजर रहा है. उसके आसपास तमाम तरह के भ्रमों का माया जाल रचा जा रहा है. जिसमें वह सच्चाई से दूर मानसिक छवियों को सच मान बैठा है. उसके आसपास के लोग उसे … Continue reading व्यक्तित्व विहीनता का फैलता साम्राज्य

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या से पहले

आज सुबह मेरे पड़ोसी मित्र ने कहा, अरे भाई परसों गणतंत्र दिवस है। क्या तैयारी चल रही है? मैने कहा कि अपनी तैयारी तो सिर्फ शारीरिक उपस्थिति तक ही सीमित है। बाकी की तैयारियां तो विश्वविद्यालय कर ही रहा है। वही हर साल का रस्मी आयोजन,राष्ट्रगान के बाद, कुछ विचार विमर्श और मिष्ठान वितरण के … Continue reading गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या से पहले

ओपिनियन राइटिंग की रिहर्सल

आजकल हमारे यहां ओपिनियन राइटिंग की क्लास चल रही है। इसी बिषय के व्यावहारिक उपयोग पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा हूं। बैठे ठाले एक विषय मिला सार्वजनिक स्थल और लोकतांत्रिक व्यवहार । तो फिर बने बनाए मूड को एक दिशा देने के लिए लिखना शुरू किया। जीवन में हमें जहां तक संभव हो लोकतांत्रिक … Continue reading ओपिनियन राइटिंग की रिहर्सल

विकास और मीडिया

मध्यप्रदेश के विकास में मीडिया की भूमिका:पिछले चालीस-पचास सालों में मध्य प्रदेश का जो विकास हुआ है उसमें मीडिया ने एक सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया है। मीडिया का मुख्य काम सूचना,शिक्षा व मनोरंजन प्रदान करने के अलावा छवि निर्माण करना भी होता है। ऐसी संस्थाएं जो सराहनीय काम कर रहीं हैं उनको प्रोत्साहित करके … Continue reading विकास और मीडिया