क्या तुम्हें हमेशा ‘सफलता’ ही मिली है?

तुम्हारे सवाल अच्छे लगते हैं। क्योंकि वो सोचने के लिए मजबूर करते हैं। ऐसा ही एक सवाल तुमने आज यूँ ही पूछ लिया? वृजेश हर बार तुम अपनी सफलता की कहानियां ही सुनाते हो, क्या तुमने जीवन में कभी किसी बात के लिए संघर्ष नहीं किया। तुम ही लोगों को सुना कर निकल लेते हो, क्या कोई ऐसा मौका आया है, जब तुम्हें लोगों ने सुनाया हो। तुमको अपने बारे में सोचने और रिफलेक्ट करने के लिए करेक्ट करने का मौका दिया हो। इस बात को सुनते हुए लगा कि शायद मेरी दास्ताँ की सकारात्मक और चीज़ों को ज़ोर देकर कहने वाली बातों में नकारात्मकता का असर अपना वजूद खोने लगता है।

सकारात्मक बातों का असर ज्यादा गहरा होता है

बीते कितने दिनों में, न जाने कितने पलों में मुझे बहुत गहरे से इस बात का अहसास हुआ है कि सकारात्मक बातों का असर नकारात्मक बातों से कई गुना ज्यादा होता है। इसलिए अपने सोचने, करने और कहने में सकारात्मक होने की कोशिश करो ताकि उम्मीद की एक किरण बाकी रहे जो तुम्हें किसी भी भयंकर से भयंकर परिस्थिति में अपना विवेक बनाये रखने और रास्ता खोजने के लिए प्रेरित करने में कामयाब हो सकेे। जब कोई बात सीधे-सीधे सरल और प्रभावशाली ढंग से कही जा सकती है तो फिर उस बात को बहुत ज्यादा घुमा-फिराकर कहने की जरूरत क्या है? माइंडसेट और ड्राइव जैसी किताबों को पढ़ते हुए महसूस होता है कि किसी एक ही विचार को अलग-अलग ‘लेबल’ के जरिये कहने की कोशिश हो रही है।

बात वही होती है, शब्द बदल जाते है

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परियों की कल्पना का एक इस्तेमाल विज्ञापन में भी देखा जा सकता है। जीवन में कुछ लोगों को अपनी उपलब्धियों के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है,. मेरी ज़िंदगी की दास्ताँ भी उन्ही आम लोगों की कहानी जैसी है, जो जीवन के छोटे-छोटे पलों में असाधरण ख़ुशी और रोमांच के लम्हों से जीवन के लिए ऊर्जा का स्रोत खोज लेते हैं।

ग्रोथ माइंडसेट और थर्ड ड्राइव यानि दिल की आवाज़ को सुनने और मानव अस्तित्व की व्यापकता और गहराई के साथ जीने की राह चुनने वाली बातों में बड़ी समानता नज़र आती है। ऐसा लगता है कि दोनों लेखक एक ही बात को अलग-अलग शब्दों में, अपने-अपने जीवन के उदाहरणों से कहने की कोशिश कर रहे हैं। एक अर्थशास्त्र और मीडिया के अनुभवों से किसी सत्य पर पहुंचने की कोशिश कर रहा है तो दूसरा मनोविज्ञान की पड़ताल के सहारे बच्चों की दुनिया से जीवन संसार का सत्य खोजने और उसे लोगों के साथ साझा करने की कठिन राह पर चलने को अपने जीवन की मंज़िल बना रहा है। मेरी ज़िंदगी का फलसफा रहा है, जीवन की सार्थकता। इस तलाश में लगा कि ज़िंदगी के कई बरस बीत गये और दरअसल ऐसी कोई चीज़ होती ही नहीं है। जीवन के बहुत से छोटे-छोटे लम्हों की ख़ुशी और ग़म को जी पाना भी एक तरह की सार्थकता है।

संवेदनशीलता को बचा पाना भी एक ‘सार्थकता’ है

जीवन की संवेदनशीलता को बनाये रखना और मशीनी बनने से बचने की पुरजोर कोशिश में भी एक सार्थकता है, जिसकी हर क़ीमत पर रक्षा करनी चाहिए। जीवन के किसी लम्हें में ख़ुशी की तलाश आपको पागलपन की हद तक बेचैन कर सकती है, मगर किसी लम्हे में आँसुओं की बहती धारा भी दिल को हल्का कर सकती है। जीवन में ख़ुशी और आँसू दोनों की जरूरत है। जैसे संघर्ष और सफलता दोनों का होना हमें ज़िंदगी के सफ़र को एक ललचाई नज़रों से और मिलने की उम्मीद में सतत चलते रहने को प्रेरित करता है। अगर सिर्फ़ संघर्ष हों तो इंसान किसी वीरान जंगल की तरह हो जाता है। बहुत सफलताओं व ख़ुशियों से भरा हो तो मुश्किल पलों का सामना होते ही भुरभुरी बलुई मिट्टी सा बरसात के पानी संग बहने लगता हैं। दोनों का साथ हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करता है। मुश्किल लम्हों में हमारी ज़िंदगी में जो चमक और रौनक दिखाई देती है, वह दुलर्भ होती है। हमारे बनने में ऐसे लम्हों का योगदान भी कुछ कम नहीं है।

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2 comments

  1. आप बहुत अच्छा लिखते हैं। आपके लेख ने बहुत प्रभावित किया है। इतना अच्छा तरीका से ज्ञान की बात की है जो काविले तारीफ है।

  2. बहुत-बहुत शुक्रिया रजनी जी। ऐसे ही पढ़ते रहिए और अपने सुझावों से अवगत कराते रहिए।

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