सेल्फी नहीं, ‘सेल्फ रिफलेक्शन’ की जरूरत है हमें

dscn3327जब कोई बात हमसे जुड़ी हो तो हमें उसके बारे जरूर सोचना चाहिए ताकि उसके बारे में विचार करके हम किसी निष्कर्ष तक पहुंच सकें और विचारों के भंवर से बाहर निकल सकें। मैं खुद से सवाल करता हूँ? उनके जवाब खोजने की कोशिश करता हूँ। आज सुबह मन ऐसे ही सवालों से दो-चार हो रहा था तो मैंने खुद को आमंत्रित किया कि आ जाओ बैठते हैं थोड़ी देर खुद से बातें करते हैं।

आजकल सेल्फ को सेंटर बना लेने का दौर है। ऐसे में किसी का आत्मकेंद्रित हो जाना बड़ी बात नहीं है। इस केंद्र के बाहर की दुनिया को समझने के उससे दूर होना भी जरूरी है और उस दायरे में बग़ैर खुद को खोये घूमना भी जरूरी है।

यह सेल्फी नहीं, ‘सेल्फ रिफलेक्शन’ का दौर है

किसी ने ऊपर लिखी बातों के बारे में कहा, “यही सेल्फी कल्चर है।”

मेरा जवाब था, “ यह बात मेरे जेहन में भी आई थी। मगर यह सेल्फी, अपने सेल्फ से दूर ले जाने वाला जरिया बन जाती है। मेरी नज़र में सेल्फी एक ऐसा आईना है, जिसमें हम अपना चेहरा तो देख पाते हैं। मगर हमारा अस्तित्व चेहरे की सुंदरता, उस पर आने-जाने वाले भावों से कहीं ज्यादा व्यापक है। इसलिए सेल्फ (स्व) को सेल्फ रिफलेक्शन, अपनी पहचान, अपने अंदाज के साथ जीने, अपना रास्ता बनाने, दूसरों के रास्तों से गुजरने और उनसे संवाद व अंतर्क्रिया के जरिए उनको व खुद को समझने वाले पहलू की तरफ मोड़ने की जरूरत है।”

शिक्षा के क्षेत्र में काम क्यों?

किताब पढ़ते बच्चेशिक्षा के क्षेत्र में तुम्हारे काम करने का लक्ष्य क्या है? शायद यही तुम अपनी रुचि का काम कर सको। उसको ज्यादा गहराई और स्पष्टता के साथ समझ सको और अपनी समझ से शिक्षा के क्षेत्र में ज्यादा अच्छा लेखन कर सको।

ताकि उन लोगों तक भी पहुंच सको, जिनसे कभी तुम्हारा मिलना हुआ नहीं है। एक दिन तुमने कहा था, “विचार वही सफल है जो क्लासरूम तक पहुंचे।” अगर यह बात सच है तो बाकी वैचारिक टकराहटों का मकसद क्या है? जाहिर सी बात है कि जो चीज़ें तय होती हैं, वही क्लासरूम तक पहुंचती है। मगर हर बार यह बात सच साबित नहीं होती।

इसलिए तुम्हें उन चीज़ों की तरफ ध्यान देना चाहिए जिनका रिश्ता ज़मीनी स्तर पर इन चीज़ों को बेहतर बनाने से है। यही तुम्हारी ताक़त है। यही तुम्हारी विशिष्टता है। तुम्हें अपने लोकस ऑफ कंट्रोल से ऑपरेट करना चाहिए। इस तरीके से तुम अपने काम के जरिए ज्यादा गहरी छाप छोड़ पाओगे। अपना योगदान सुनिश्चित कर पाओगे। बाकी रास्तों में बौद्धिक बहसों की लंबी शृंखला है, मगर उसका हासिल बौद्धिक मनोरंजन और अपनी बात मनवा लेने की ख़ुशी के सिवा कुछ भी नहीं है।

आज भी प्रासंगिक हैं गाँधी

इस विचार प्रक्रिया में महात्मा गांधी की एक बात याद आती है कि जो सुझाव हम दूसरों को देना चाहते हैं, पहले हमें ख़ुद उसपर अमल करके देखना चाहिए। तो इसका अर्थ अपने काम के संदर्भ में यही होगा कि अगर हम चाहते हैं कि हमारे शिक्षक अपने काम के बारे में चिंतन (सेल्फ रिफलेक्शन) करें और अपने सेल्फ रिफलेक्शन को लिखें तो शायद हमें ख़ुद भी इस प्रकिया को जीकर देखना होगा, तभी हम सही मायने में उनकी मदद कर पाएंगे और उनके मदद की तैयारी के लिए खुद को एक दिशा दे पाएंगे। अपने ख़ुद के पेशेवर कौशलों व क्षमताओं का विकासशील क्षेत्रों की पहचान कर पाएंगे, जिनपर और ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

कल एक आलेख में इस बात का जिक्र मिला कि हम जिनके लिए काम करते हैं। हमें उनकी बात जरूर सुननी चाहिए। यानि हम जिन बच्चों, शिक्षकों, अभिभावकों, समुदाय के लिए काम करते हैं, उनकी बात जरूर सुननी चाहिए। यानि इस काम के लिए वक़्त निकालना चाहिए और उन सवालों के बारे में सोचना चाहिए जो इस दिशा में होने वाले प्रयासों को बेहतर बना सकते हैं। ऐसे सहज सवालों तक पहुंचने का रास्ता बना सकते हैं जो सीधे लोगों से जुड़ सकें और इस साझा संवाद संवाद से वास्तविक परिस्थिति को समझने में मदद मिल सके।

आखिर में दो बातें, “मेरी कोशिश है कि मैं अपने सामने मौजूद विचारों पर चिंतन की प्रक्रिया में खुद को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ पाऊं। अपने परेशानियों को रेखांकित कर पाऊं। अपनी ताक़त को समझ पाऊं। अपनी कमज़ोरियों को पहचान पाऊं। अपने काम को अपने जीवन के व्यापक संदर्भों से जोड़कर देख पाऊं। ताकि अपने प्रभाव के दायरे में रहते हुए चीज़ों को समझ सकूं और बदलने में अपना योगदान दे सकूं। जह हम पहले से विफल व्यवस्था को सफल बनाने की दिशा में प्रयास कर रहे होते हैं तो हमें ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो विफल व्यवस्था के स्थाई कल-पुर्जों की भांति काम करने की बजाय नए तरीके से काम करने में यक़ीन रखते हों, समस्याओं के समाधान के लिए लंबा सफर तय करने, धैर्य़ के साथ अपनी भूमिका को बार-बार याद करते हुए आगे बढ़ें ताकि भूल न जाएं कि हमारा किसी सफर के ख़ास पड़ाव का लक्ष्य क्या है, उस पड़ाव पर रुके होने का मक़सद क्या है?”

जीवन का यह पड़ाव भी लंबे रास्ते का एक छोटा सा हिस्सा है। इसलिए चीज़ों को समझो। जहाँ लगे कि योगदान करना है, करो। जहाँ लगे कि ग़ौर से चीज़ों को देखना है देखो। मगर ख़ुद को ठहराव वाली स्थिति से बाहर ले जाने के लिए सदैव तत्पर रहो। कोशिश करते रहो।

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2 comments

  1. आप बहुत अच्छा लिखते हैं। मेरे विचारों से आपका विचार मैच करता है। हमारे समाज और हमें आप जैसे लेखक की बेहद जरूरी है।

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