10 सालों में कितना बदल गया डीएवी कॉलेज?

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साल 2007 में बीएचयू से इकॉनमिक्स ऑनर्स की पढ़ाई पूरी हुई। यहां से फिर गुजरते हुए लगा, “कुछ सपनों की तलाश हमें परिंदे में तब्दील कर देती है।”

10 साल बाद 2017 में डीएवी कॉलेज में जाना हुआ। अब डीएवी कॉलेज, डीएवी पीज़ी कॉलेज हो गया है। हमारे समय जो शिक्षक अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान पढ़ाया करते थे, अाजकल अपने-अपने विभाग के विभागाध्यक्ष हैं। वहां आना, बीते दिनों की यादों को फिर से छेड़ने और उन दिनों की ऊर्जा को फिर से महसूस करने की एक कोशिश की तरह था। सो दोपहर में गोदौलिया से नई सड़क होते हुए कबीर चौरा जा पहुंचे और वहां के डीएवी पीजी कॉलेज।

यह कॉलेज काशी हिंदी विश्वविद्यालय का इकलौता कॉलेज है जहाँ बीए और एमए में दाख़िला मिलता है, बाकी सारे कॉलेज लड़कियों के लिए हैं। इस कॉलेज में आने वाले छात्रों के सामने अज़ीब सी परिस्थिति होती है। एक तरफ बीएचयू में दाख़िला लेने का सपना। फिर कैंपस से बाहर पढ़ने का विकल्प। यहां के छात्रों की पढ़ाई भले ही कॉलेज में होती है, मगर उनकी परीक्षाएं बीएचयू के कैंपस में ही होती है। परीक्षा परिणाम पर भी बीएचयू का नाम होता है। ग़ौर करने वाली बात है कि यहां के छात्र विभिन्न विषयों में टॉप भी करते हैं।

डीएवी डिग्री कॉलेज अब डीएवी पीजी कॉलेज है

 इस साल के नैक ग्रेडिंग में इस कॉलेज को ए प्लस की ग्रेडिंग मिली है। इसके लिए शिक्षकों को काफी मेहनत करनी पड़ी और शैक्षिक माहौल को बेहतर बनाने के साथ-साथ सह-शैक्षिक गतिविधियों, सेमीनार जैसी चीज़ों को काफी प्राथमिकता दी गई। इसके साथ ही कॉलेज को ज्यादा व्यवस्थित ढंग से सुसज्जित किया गया। हालांकि बहुत महाने लोगों के विचार लिखे हुए हैं। जो अगर नहीं भी लिखे होते तो बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। इन विचारों को देखकर ऐसा भी लगता है कि मानो विचारों के जंगल में भटक रहे हैं। ऐसे विचार जो स्थापित हैं। मगर हर नए दौर को नए विचारों की जरूरत होती है। इसका अहसास डॉ. कलाम के विचारों में मिलता है, जिनको पहली बार बीएचयू के सालाना दीक्षांत समारोह में प्रत्यक्ष देखने का मौका मिला था।

यहां मनोविज्ञान विभाग की प्रयोगशाला में अलबर्ट एलिस से लेकर फ्रायड और विभिन्न मनोवैज्ञानिकों की तस्वीरें सुसज्जित हैं। यहां की प्रोफ़ेसर डॉ. रिचा रानी यादव ने कहा कि हम विभाग को बेहतर बनाने के लिए अपने प्रयासों को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने छात्रों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने और कॉलेज स्तर पर होने वाले विभिन्न प्रयासों के बारे में बताया।

इस समय इस विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सत्य गोपाल हैं। हमारे समय में आप सांख्यिकी पढ़ाते थे। इसके साथ ही सामान्य मनोविज्ञान के कुछ टॉपिक भी आपने पढ़ाए थे। मेरे सबसे ज्यादा नंबर हमेशा मनोविज्ञान में ही आए। हालांकि ऑनर्स के लिए मैने इकॉनमिक्स चुना। मगर मुुझे जिस विषय ने चुना था, वह मनोविज्ञान ही था। शिक्षा के क्षेत्र में अपने व्यावहारिक अनुभवों से मनोविज्ञान के विभिन्न संप्रत्ययों को समझने वाले उदाहरणों से संपन्न किया। मनोविज्ञान की हिंदी मीडियम वाली किताबों में उदाहरणों का अभाव खटकता है। अब समझ में आता है कि उदाहरणों के लिए व्यावहारिक अनुभवों की ज़मीन तक पहुंचना होगा। इसके लिए सिद्धांतों की सुविधाजनक ज़मीन से आगे बढ़ना होगा और इसके लिए सतत अपने आब्जर्बेशन व अनुभवों को दर्ज़ करना होगा तभी उदाहरणों को लिखा जा सकता है। इस विषय पर सत्यगोपाल सर से चर्चा हुई।

अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष से बातचीत

अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष बिमल शंकर सिंह सर से मिलकर काफी अच्छा लगा। दस सालों के सफ़र में उम्र का असर उनके ऊपर साफ़ दिख रहा था। मगर इतने सालों में भी आत्मीयता और छात्रों से उनका लगाव ज्यों का त्यों बना हुआ है। उनसे बातचीत के दौरान लग रहा था, जैसे दस सालों का फ़ासला हौले-हौले पट रहा है। एक ज्यादा यथार्थवादी तस्वीर मन में बन रही है। उन्होंने काम के बारे में पूछा कि इस समय क्या काम कर रहे हो? मैंने बताया कि बीते सालों में शिक्षा के क्षेत्र में लीडरशिप, रीडिंग स्किल व रीडिंग हैबिट के बाद अभी प्रोफ़ेशनल माइंडसेट और बिहैवियर पर काम कर रहे हैं सेकेंडरी स्कूलों के साथ।

तो उन्होंने कहा कि शिक्षकों की मानसिकता या सोच में बदलाव लाना काफ़ी मुश्किल काम है क्योंकि इंटर कॉलेज में प्रतिष्ठित कॉलेजों को छोड़कर बाकी प्रिंसिपल व शिक्षकों को लगता है कि इससे हमें क्या फ़ायदा होगा? मगर यह अच्छा है कि कोई संस्था यह काम बग़ैर किसी पैसे के कर रही है। बहुत से कॉलेज अपनी ग्रेडिंग को बेहतर बनाने के लिए इन्हीं मुद्दों पर पेड सेवाएं ले रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने बाकी छात्रों का भी जिक्र किया कि उनके साथ निरंतर बातचीत होनी चाहिए ताकि एक सपोर्ट सिस्टम बना रहे। आज के समय में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। हर मुद्दे पर परिवार के साथ आप बातचीत नहीं कर सकते, ऐसे में जरूरी है कि दोस्तों के साथ निरंतर संवाद बना रहे।

मनोविज्ञान में पीजी और पीजी डिप्लोमा इन काउंसिलिंग की शुरूआत

अब यहां मनोविज्ञान में एमए की पढ़ाई भी होती है। इसके साथ ही मनोविज्ञान में पीजी डिप्लोमा इन काउंसिलिंग की भी शुरूआत हुई है। मनोविज्ञान विभाग की एक प्रोेफ़ेसर ने कहा, “प्रोफ़ेशनल माइंडसेट और बिहैवियर जैसा काम का उन शिक्षकों के लिए ज्यादा उपयोगी है जो शहरों से दूर हैं। जिनको बहुत तरह का एक्सपोज़र नहीं है। वहां के शिक्षक ऐसे काम को ज्यादा महत्व देते हैं। बड़े शहरों में ऐसे काम के लिए सहयोग जुटाना एक चुनौतीपूर्ण काम है। इसलिए जरूरी है कि हम ज्यादा यथार्थवादी होकर चीज़ों को देखें और उन प्रेरित शिक्षकों को आगे आने के लिए प्रोत्साहित करें जो सच में अच्छा काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कॉलेज में स्तर पर ऐसे संवाद और सहयोग का अभाव है, यहां तो प्रतिस्पर्धा ज्यादा है।”

उन्होंने छात्रों के बारे में कहा कि हमारी कोशिश होती है कि छात्रों को पूरा सहयोग दिया जाए ताकि उनकी पढ़ाई में रुचि बने और वे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में रिसर्च के लिए खुद को तैयार कर पाएं।

उनकी बातों से पता चला कि ज्यादा एक्सपोजर भी हमें नए अनुभवों के लिए प्रयास करने से रोकता है। हमें काफी प्रयास करना होता है कि जो चीज़ आसानी से सुलभ है उसका लाभ लिया जाए। दिल्ली विश्वविद्यालय में ट्रांसलेशन वाले कोर्स की पढ़ाई के दौरान महसूस हुआ कि बहुत से मौके हैं जो विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। मगर उसके लिए समय देने की प्राथमिकता हर छात्र की दिनचर्या में नहीं होती। विभागीय दायरा भी इसमें एक बाउंड्री की तरह काम करता है।

क्या-क्या बदलाव हुए?

हमारे समय में 2004-2007 के सत्र में साल में एक बार परीक्षा होती थी। अभी सेमेस्टर सिस्टम लागू है। इससे छात्र साल में दो बार परीक्षाओं की प्रक्रिया से होकर गुजरते हैं। हमारे समय में पढ़ने के लिए ज्यादा वक्त मिल जाता था। अभी छात्रों और प्रोफ़ेसर दोनों स्तरों पर व्यस्तता काफी बढ़ गई है। पहले यहां ग्रेजुएशन स्तर की पढ़ाई होती थी, अभी पोस्ट ग्रेजुएशन की भी पढ़ाई होती है। नैक की तरफ से ए प्लस ग्रेडिंग के साथ कॉलेज शैक्षिक और सह-शैक्षिक गतिविधियों में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। यहां के छात्रों के लिए ई-लायब्रेरी की अच्छी व्यवस्था है। लायब्रेरी में किताबों की संख्या बढ़ी है। फैकेल्टी में सदस्यों की संख्या बढ़ी है। विभिन्न विषयों में शोध भी हो रहे हैं। बीते 10 सालों में यह बदलाव साफ़-साफ़ नज़र आता है। टेक्नॉलजी का इस्तेमाल शिक्षण के लिए हो रहा है, पहले ऐसी सुविधाएं नहीं थी। शिक्षकों का छात्रों के सा जो लगाव है वह ज्यों का त्यों बना हुआ है, यह बात सबसे ज्यादा ग़ौर करने वाली है।

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4 comments

  1. आप बहुत अच्छा लिखते हैं। मुझे प्रसन्नता हुई की आपने हमारे शहर से जुड़ी हुई घटनाओं को बहुत सारे जानकारी को शेयर किया।

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