अपनी बात कहने के लिए शब्दों की तलाश क्यों हैं?

word-cloud-for-e-portfolioलंबे समय बाद दिल की बात लिखने के लिए बैठो तो ऐसा ही होता है। शब्दों की तलाश होती है। भावों की खोज होती है। एक धुंध होती है। जिससे होकर गुजरना पड़ता है ताकि हम अपनी बात को कहने का मौलिक प्रवाह खोज सकें। ऐसा ही हाल आज का है।

पिछली पोस्ट 8 फरवरी को लिखी थी, जब ‘वैलेण्टाइन वीक’ चल रहा था। इस बीच इस दुनिया में बहुत कुछ बदल चुका है। वैलेण्टाइन डे वाली कहानी यूपी में सत्ता परिवर्तन से लेकर ‘एंटी रोमियो’ तक आ पहुंची है।

‘हिंसा’ हमारे स्वभाव का हिस्सा तो नहीं बन रही?

हर चीज़ में हिंसा का प्रवेश हो रहा है। चाहे वे निजी रिश्ते हों, समाज हो, राजनीति हो या फिर भाषा का मामला हो। यहां तक कि सरकारी विज्ञापनों की भाषा भी काफी आक्रामक हो गई है। यह आक्रामकता साल 2014 से अपना स्पेश तलाश रही थी। अब अपना विस्तार पा रही है। यह आक्रामकता भविष्य में क्या गुल खिलाएगी कहना मुश्किल है, मगर एक सहज अनुमान तो लगाया ही जा सकती है कि यह दौर अतिवाद का है। छोटी सी बात का बतंगड़ बना देना आज के दौर में एक हुनर है। तिल का ताड़ बना देना एक विशेषज्ञता है। इसका इस्तेमाल मीडिया में फर्ज़ी ख़बरों को बढ़ावा देने के लिए धड़ल्ले से किया जा रहा है।

किसान और देश के जवान

उच्च शिक्षा की उपेक्षा का एक नया दौर शुरू हो गया है। पीएचडी की सीटें घटाई जा रही हैं। सेमेस्टर सिस्टम का दबाव छात्रों पर ज्यों का त्यों बना हुआ है। दिल्ली में जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसान कर्ज़ माफ़ी की उम्मीद में धरने पर बैठे हैं, मगर सरकार का दिल कोई मोम का थोड़े है जो अप्रैल की गर्मी से पिघल जाएगा सो उनका धरना जारी है। उन्होंने मूत्र पीकर सरकार का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास किया, मगर सारे प्रयास बेकार सरकार की तरफ से किसी तरह के राहत की घोषणा उनके लिए नहीं की कई है। किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? सुकमा में जवान क्यों मर रहे हैं? इस सवाल से ज्यादा लोगों का ध्यान इन बातों पर है कि आईपीएल में कौन जीत रहा है? बाहुबली ने कटप्पा को क्यों मारा?

‘पब्लिक’ कहां बिजी है?

बाहुबली-2 की कमाई के आँकड़े बताते हैं कि शहरी जनता अपने मनोरंजन में व्यस्त है। वीकेंड का लुफ्त उठा रही है। किसानों के धरने, जवानों के मरने और छात्रों के ख़िलाफ़ फर्जी ख़बरें लिखे जाने से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता। जिनको फर्क पड़ता है वे अपनी बात कह भी रहे हैं। कहनी भी चाहिए। जेएनयू में सुकमा के शहीदों पर शोकसभा हो रही है, मगर ख़बरें चल रही है कि वहां जश्न मनाया जा रहा है, यह हमारे देश का मीडिया है। ख़ैरियत है कि इसकी पोल खोलने वाली ख़बरें छपीं और इसके खिलाफ शिकायत भी की गई है। अफ़वाहों को पंख लगे हैं और ख़बर रेंग रही है, आज के दौर के बारे में यही कहा जा सकता है। शेष फिर अगली पोस्ट में।

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4 comments

  1. आपके लेख काफी ज्ञान से भरे भंडार के समान है। समय अभाव के कारण इतना ही पढ पायी समय मिलने पर फिर उपस्थित होगे आप के ब्लॉग पर। धन्यवाद।

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