वैलेण्टाइन वीकः प्रेम के उत्सव की खुमारी रंग ला रही है

pic-from-shoping-mallकई सारे मित्र तो आजकल प्रेम रस से सराबोर लग रहे हैं। लगता है साप्ताहिक प्रेम के उत्सव (वैलेण्टाइन वीक) की खुमारी रंग ला रही है। पत्रकार साथी तो अपनी खबरों में अपने प्रेम का सारा अनुभव रस निचोड़ रहे हैं, तो कोई गुलाब न मिलने के कारण दुःखी है। तो कोई लाल, गुलाब का सुर्ख रंग सफेद होते देख कर हैरान है।

प्रेम के विविध रंग

प्रेम शब्द भी बड़ा निराला है। भारत में तो इसको आध्यात्म से जोड़कर प्रकृति और ईश्वर के करीब खड़ा करने की तमाम कोशिशें की जाती हैं। लेकिन इंसानों के बीच प्यार और संबंधों को आध्यात्मिक जीवन की तरक्की में बाधक और अनैतिक समझा जाता रहा है। अभी भी हमारे अध्यापक कहते मिल जाते हैं कि अरे आजकल के छात्रों का तो नैतिक पतन हो गया है। अगर वे भी आज के दौर में होते तो शायद वे भी पतन प्रेमियों की लिस्ट में अपना नाम शुमार कर रहे होते।

अच्छा है मुझे ऐसे अध्यापकों से मिलने का मौका मिला। जिन्होनें छात्रों की प्रेमिकाओं के लिए प्रेम पत्र लिखकर मिशाल दी थी। यह और बात है कि एक वक़्त उन्होनें कहा था कि हमें कम उम्र में शादी कर लेनी चाहिए। ताकि प्रेम के लफड़े में होने वाले तनावों से मुक्ति पा सकें। कई सारे साथी लिखते हैं कि जो हमसे दिल से बात करता हो, उससे बात करने के लिए दिल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उनके लिए कहना है कि दिल और दिल मिलकर दिलदार भले बनाते हों, लेकिन समझदारी में थोड़ी कसर छोड़ जाते हैं। प्यार में अपने हाल पर अनियंत्रण पर तो तमाम गाने रचे जा चुके हैं। मुहावरों की तो भरमार है, प्यार अंधा, गूंगा, बहारा,,,जाने क्या-क्या होता है। लेकिन प्यार देखता, सुनता और बोलता है इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता। दिल के साथ दिमाग का भी समन्वय होना जरूरी है।

पहले प्यार की यादें

img-20161225-wa0008कुछ साथी बंदरिया के मरे हुए बच्चे सरीखे पहले प्यार को गले लगाए बैठै हैं, कहते हैं कि वो नहीं मिला जिसका इंतजार था। अरे बताओ तो सही वह कौन था/ कौन थी ? शायद हम भी कोई मदद कर पाएं। कुछ साती पुराने प्रेम से आज़िज आ गए हैं। उस रिश्ते की परछाई से भी दूर भाग जाना चाहते हैं।

उनसे तो हमने कहा कि अगर प्रेमी दिलों को मिलाने के टिप्स सिखाने वाली तमाम फिल्मे, संगीत, साहित्य रचे गए हैं। तो दिल तोड़ने वाले नुस्ख़ों का भी बाजार वैलेण्टाइन के चाहने वालों से कतई कम नहीं है। सारे प्रेमी जानते हैं कुछ खास दिनों में बेवफाई के गानों के अर्थ पुर्नजीवित हो उठते हैं।

जिन प्रेम के गानों और दृश्यों को देखकर मुंह बिचकाते थे। उसमें भी रस आने लगता है। हम अपने मित्रों से अक्सर मज़ाक में कहा करते हैं कि हम तो ब्रेक-अप कराने वाला टूल डिजाइन करने के लिए सोच रहे हैं। हमारी एक साथी कहती हैं कि वे अपने कॉलेज के दिनों में ब्रेकिंग मशीन के नाम से जानी जाती थीं। अगर किसी प्रेम प्रपंच में कोई उलट-फेर करना होता था लोग उनकी हेल्प लेते थे। ऐसे प्रेमियों के लिए कसल्टेंशी खोलने का भी विचार भी काम आ सकता है। अगर आप अपने पिछले प्रेमी से हैं परेशान तो मनोज तिवारी के गाने के तरह, लड़की के पहले प्रेमी की तरह पुलिस लेकर आने और रकीब को मारने पीटने की जरूरत नहीं हैं, लोकतांत्रिक तरीके से निजात पाने की तरीके आजमाए जा सकते हैं, फिल्मों की तरह दारू पीकर आने के नुस्ख़ भी काम नहीं आने वाले हैं। अब तो पीना-पिलाना भी ऐतराज़ की बात नहीं मानी जाती।

प्रेम की बेखुदी

शहरी परिवेश का सामाजीकरण हमें बहुत गहराई से प्रभावित करता है। गांव की खुशबू के साथ पले-बढ़े होने के नाते इस एहसास को गहराई से महसूस कर पाते हैं। वर्ना हम भी भेड़चाल में खुद को जाने बिना बिना गा रहे होते कि बुल्ला की जांणां मैं कौन………..इतनी तो बेख़ुदी नहीं है।

लेकिन इस प्रेम की बेखुदी के खुमार में कुछ पल को घुल जाने का अपना आनंद है। उसकी अपनी बंदिशें हैं और अपनी आजादियां है।बदलते वक़्त में प्रेम की जरूरत बढ़ रही है। अकेलापन बढ़ रहा है। ऐसे में प्रेम की चाहत बढ़ रही है। आगे की कहानी तो आप खुद अपने अनुभव से आगे बढ़ा सकते हैं………….इसलिए मेरी तरफ से खामोशी…।

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