रिश्तों की खुशी कहां खो गई?

DSCN2614आज एक दीदी से कई सालों बाद बात हो रही थी। मैंने संगीत की उनकी रुचि के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि संगीत की तरफ़ वापसी अब बहुत मुश्किल है। अब तो आगे ही देखना है। बच्चों की पढ़ाई और बाकी सारी जिम्मेदारियां हैं। अपनी किसी सहेली से बात करो तो भी पति को परेशानी होती है। यहां लोगों के दिमाग तो दोस्त जैसा कोई कांसेप्ट ही नहीं है।

उन्होंने कहा, “मैं बहुत कुछ करना चाहती थी। संगीत की अपनी रुचि को बहुत आगे ले जाना चाहती थी। लेकिन शायद मैं कमज़ोर थी। मैं उतनी मजबूत नहीं थी और मेरे पास तुम्हारे जैसा पैरेंट्स का सपोर्ट भी तो नहीं था। मेरे पैरेंट्स ने किसी चीज़ के लिए मना तो नहीं किया लेकिन प्रेरित भी तो नहीं किया। भैया भी तो बहुत कुछ करना चाहते थे। लेकिन उन्होंने अपने सपनों को मरने दिया। वे तो आज तक बहुत सारी बातों से उबर नहीं पाए हैं। उनको आज भी परिस्थितियों को सामना करने में तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।”

उनकी बातों को सुनते हुए लग रहा था कि ज़िंदगी की ख़ुशियों का अंत कितनी आसानी से विपरीत परिस्थितियों में होता चला जाता है। लेकिन उसी ज़िंदगी को ख़ुशहाल बनाने में और उसमें रंग भरने में बहुत मुश्किल होती है। कभी हमारे जीवन की परिस्थितियां सामने आ खड़ी होती हैं। तो कभी हमारे आसपास का परिवेश तो कभी सालों से चली आ रही पुरानी मान्यताएं आड़े आती हैं जिनको बदलना किसी व्यक्ति के वश की बात नहीं होती। ऐसे में अगर हमको समझने और सपोर्ट करने वाले लोग न हों तो ज़िंदगी और मुश्किल हो जाती है। परेशानियां और बढ़ जाती है।

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