अनुवादः आख़िर क्या है ‘तत्काल भाषांतरण’?

जब अनुवाद लिखने के स्थान पर बोलकर किया जाता है तो उसे तत्काल भाषांतरण की संज्ञा दी जाती है। डॉ. सुषमा भटनागर के अनुसार, “तत्काल भाषांतरण बोलकर किया जाता है। यह एक वक़्ता के लक्ष्य भाषा की मौखिक अभिव्यक्ति को श्रोताओं की भाषा में मौखिक अनुवाद के माध्यम से पहुंचाने की प्रक्रिया है। तत्काल भाषांतरण में भाषांतरकार वक़्ता की बात को सुनने, समझने, समझने के साथ ही श्रोताओं की भाषा में तत्काल रूपांतरित करके मौखिक रूप से पहुंचाता है।”

भाषांतरकार यह कार्य बग़ैर किसी शब्दकोश के करता है। इस प्रक्रिया के दौरान अनुवाद के दौरान जो सहायक सामग्री होती है, वह बाधक बन जाती है। इसीलिए भाषांतरण को लिखित अनुवाद की तुलना में जटिल प्रक्रिया माना जाता है। डॉ. भटनागर कहती हैं, “एक भाषांतरकार में योगियों जैसी समाधि, बौद्धों जैसा निर्वाण और पागलों जैसी विस्मृिति एक साथ होनी चाहिए। ताकि जब वह काम में तल्लीन हो तो फिर उसका ध्यान कहीं और न भटके। इसके साथ-साथ अच्छी स्मृति को भाषांतरकार की प्रमुख खूबी बताती हैं।” उनके मुताबिक़ किसी की स्मृति अगर चलनी जैसी है और वह ठंडे दिमाग वाला नहीं है तो इस प्रोफ़ेशन में उसके लिए काम करना बेहद मुश्किल होगा। भाषांतरकार को पुरानी बातों का संदर्भ देना पड़ सकता है और उत्तेजित अवस्था में कही गई बातों को भी शालीनता और शांतचित्त के साथ रखना होता है।

एक भाषांतरकार को एकाग्र, बुद्धि से कुशाग्र और स्वभाव से अध्ययनशील होना चाहिए। उसमें चीज़ों को जानने की एक जुनून होना चाहिए। इससे उसे विभिन्न विषयों और मुद्दों की समझ होगी क्योंकि भाषांतरण के समय आपके सामवने किसी भी तरह के मुद्दे बतौर संदर्भ आ सकते हैं। इसके साथ-साथ एक भाषांतरकार को स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दोनों से भली भांति अवगत होना चाहिए ताकि वह अपने श्रोताओं की भाषा की लोकोक्ति, कहावतों, मुहावरों का प्रयोग करते हुए बोधगम्य मौखिक अभिव्यक्ति के माध्यम से अपनी बात पहुंचा सके। भाषांतरण के बारे में माना जाता है कि यह कार्य कोई भी कर सकता है, लेकिन भाषांतरण का कार्य कितना मुश्किल है…इसका अनुमान व्यावहारिक परिस्थिति का सामना करने वाले ही बताते हैं। मौखिक रूप से बोलने का अभ्यास एक भाषांतरकार के लिए बेहद जरूरी है ताकि वह धारप्रवाह तरीके से भाषांतरण का काम कर सके। इस काम की उसे आदत सी हो जाए। एक मानसिक तैयारी के बाद भाषांतरण का काम सुगम हो जाता है। लेकिन यह एक ऐसा कार्य है जिसके लिए आपको सतत प्रयास करना होता है और समय के साथ भाषांतरकार भी परिपक्व होता है।

यह बात काबिल-ए-ग़ौर है कि तत्काल भाषांतरण सदैव मौखिक होता है। भाषांतरण के कई प्रकार होते हैं। जैसे दुभाषिए के रूप में भाषांतरण, सम्मेलनों में भाषांतरण, लिखित का मौखिक भाषांतरण, समानांतर या तत्काल भाषांतरण। सम्मेलनों में भाषांतरण की शुरुआत 20वीं शताब्दी के दूसरे दशक में 1919 में पेरिस शांति सम्मेलन में हुई थी। उसके बाद तो यह सिलसिला सदैव आगे ही बढ़ता रहा। भाषांतरकार के लिए अंग्रेज़ी भाषा के इंटरप्रेटर शब्द का प्रयोग किया जाता है। एक भाषांतरकार को खान-पान संबंधी सावधानी भी बरतनी चाहिए और लोकोक्तियों, मुहावरों और कहावतों का सतत अध्ययन और संबर्धन करना चाहिए।

भाषांतरकार को भाषांतरण के दौरान यह ध्यान रखना चाहिए कि वह तेज़ आवाज़ में न बोले। उसकी आवाज़ में खनक और उच्चारण में स्पष्टता होनी चाहिए। लेकिन उसकी आवाज़ में बहुत ज़्यादा अभिनय भी नहीं होना चाहिए। उसकी आवाज़ का स्वाभाविक और सहज होना ज़्यादा प्रभावकारी होता है। एक भाषांतरकार को सदैव वक़्ता की बात को ग़ौर से सुनना चाहिेए। उसे बहुत ऊंची आवाज़ में बोलने और बहुत ऊंची आवाज़ में रेडियो, टेलीविजन या संगीत सुनने से बचना चाहिए। हमारी आँखें तो झपक जाती हैं, लेकिन कान कभी नहीं झपकते यानि कानों को भी आराम की मुद्रा में रहने का मौका देना चाहिए।

डॉ. सुषमा भटनागर कहती हैं, “एक अच्छे भाषांतरकार को सदैव धीमी आवाज़ में सुनने का अभ्यास करना चाहिए। तेज़ आवाज़ में टेलीविज़न या रेडियों का सुनना आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है। इसके साथ-साथ तेज़ आवाज़ में सुनने और बोलने से थकान होती है हमें इस बात को भी भाषांतरण के दौरान याद रखना चाहिए। भाषांतरण करते समय आवाज़ की उतार-चढ़ाव का ध्यान रखें और विराम का इस्तेमाल करें।” इसके साथ-साथ भाषांतरकार को एक बात गांठ बाँध लेनी चाहिए कि वह जो बोल रहा है उस पहले ख़ुद समझ ले। भाषांतरण करते समय एक भाषांतरकार को वक़्ता को सुनना भी होता है, समझना भी होता है, बोलना भी है और बोलकर समझाना भी है।

वह कहती हैं,  “अगर भाषांतरण करते समय कुछ छूट जाए या ग़लत हो जाए तो आपको व्यक्तिगत स्पष्टीकण नहीं देते हुए आगे बढ़ जाना चाहिेए। अगर भाषांतरण ऐसे माहौल में हो रहा है जहाँ इसकी गुंजाइश है तो आप तथ्यों को सुधार सकते हैं। शुरुआत का पहला वाक्य ट्रिकी होता है….इसलिए सामने वाला वक़्ता क्या बोल रहा है…कुछ सेकेंड सुनने के बाद आप भाषांतरण शुरू कर सकते हैं।” एक भाषांतरकार भाषा की प्रकृति के प्रति काफ़ी सजग होता है जैसे भाववाचक संज्ञा के मामले में हिंदी बहुत आगे है। वहीं हिंदी में एक्टिव वॉयस का प्रयोग होता है जबकि अंग्रेज़ी भाषा में पैसिव वॉयस का प्रयोग होता है। भाषांतरण के समय बात को सीधे-सीधे बोलकर समझाने का प्रयास करना चाहिए।

सीखने के संदर्भ में डॉ. भटनागर एक महत्वपूर्ण तथ्य की तरफ़ ध्यान आकर्षित करते हुए कहती हैं, “एक अच्छे भाषांतरकार को कभी-कभी कुछ बातों को भूलाना भी पड़ता है जो उसने सीखीं थीं।” यानि एक भाषांतरकार को ग़लत अभ्यास को तोड़ने के लिए और प्रोफ़ेशन की जरूरतों के अनुसार नई चीज़ें सीखने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।

डॉ. भटनागर कहती हैं कि एक कुशल भाषांतरकार में निम्न गुणों का होना आवश्यक है-

1.उसकी श्रवणशक्ति अच्छी होनी चाहिए। 2.एक सार्वजनिक वक़्ता  की तरह उसे लोगों के सामने बोलने में झिझक या संकोच नहीं करना चाहिए। उसके बोलने की शैली प्रभावशाली होनी चाहिए। एक भाषांतरकार या आशु अनुवादक को अपने फ़ैसले स्वयं लेने और अपना काम स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए क्योंकि उसे अपने काम के लिए सारी तैयारी स्वयं करनी होती है और इस काम के दौरान उसे अपने सहयोगियों और वरिष्ठ लोगों से कोई मदद नहीं मिलती। भले ही काम समाप्त होने के बाद उसे वरिष्ठ साथियों की तरफ़ से सुझाव और मदद मिले, लेकिन काम के दौरान मदद की उम्मीद उसके काम में बाधा ही डालेगी। अतः ख़ुद से अपनी मदद करने की आदत डालना और ख़ुद से चीज़ों का समाधान खोजने की आदत उसे भाषांतरण के क्षेत्र में आगे ले जाने में मदद करेगी। उसके भीतर आत्मविश्वास होना चाहिए। उसे किसी भी स्थिति में घबराना या भयभीत नहीं होना चाहिए।3. स्रोत और लक्ष्य भाषा पर मजबूत पकड़ जरूरी है। 4. आत्मउन्मोचन यानि उसे भाषांतरण का काम पूरी वस्तुनिष्ठता के साथ करना चाहिए।

निष्कर्षः अंततः हम कह सकते हैं कि भाषांतरण मौखिक अनुवाद है, जो दो अलग-अलग भाषाओं के बोलने वाले लोगों या समूहों के बीच संवाद का सेतु निर्मित करता है। इसकी विशेषता है कि यह बोलकर किया जाता है। लिखित अनुवाद की तुलना में भाषांतरण जटिल है। एक अच्छे भाषांतरकार का एक गुण यह भी है कि वह स्रोत भाषा की संरचना से कभी आतंकित न हो और भाषांतरण के समय लक्ष्य भाषा की प्रकृति को बनाए रखे। एक भाषांतरकार शब्दों का पीछा नहीं करता, बल्कि वह भाषण के मूल तत्व को पकड़ने की कोशिश करता है। एक भाषांतरकार में भाषण की कला तो होनी चाहिए, इसके साथ-साथ उसमें पर-मानस प्रवेश जैसी क्षमता भी होनी चाहिए ताकि वह वक़्ता को समझते हुए भाषांतरण का काम करे। इस तरह की योग्यता समय और अनुभव के साथ विकसित होती है।

एक भाषांतरकार को वक़्ता की भाव-भंगिमा पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि जो शब्दों में नहीं होता उसकी अभिव्यक्ति बॉडी लैंग्वेज से पता चलती है। एक भाषांतरकार को निरंतर पढ़ना चाहिए और विभिन्न विषयों को जानने की जिज्ञासा उसमें होनी चाहिए क्योंकि भाषांतरकार को अपने काम के दौरान विविध विषयों से रूबरू होना पड़ सकता है। भाषांतरकार को भाषा का अर्थ समझने के लिए तुलना से ज़्यादा विरोध पर ध्यान देना चाहिए। यानि पर्यायवाची से ज़्यादा विलोम शब्दों पर ध्यान देना चाहिए ताकि किसी कही हुई बात का ज़्यादा सटीक अर्थ समझ सके और श्रोताओं को समझा सके।

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