लोकसभा चुनावः राजनीति के समंदर में आती-जाती लहरें

16वीं लोकसभा के चुनाव अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहे हैं. सात मई को आठवें चरण के चुनावों की तैयारियां चरम पर हैं. लंबे चुनावों के कारण बड़ों के साथ-साथ बच्चों को भी नतीज़ों का इंतज़ार है. वे भी अपने बड़ों से पूछ रहे हैं कि कौन जीता? यानि किसकी सरकार बनी. लोकसभा के चुनाव के विभिन्न चरणों में क्षेत्रीय मुद्दों और स्थानीय समीकरणों का ख़ासा महत्व दिखाई दे रहा है. इसके कारण विभिन्न सीटों पर मुकाबला काफ़ी दिलचस्प हो गया है.

इसके कारण राजनीतिक विश्लेषकों की राय भी काफ़ी बंटी हुई है. यूपी में समाजवादी पार्टी के कई विधायक मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने के सपने को सच करने के लिए लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं. सारे अख़बार, चैनल विश्लेषणों और कयासों से भरे हैं. पत्रिकाओं में मोदी के प्रधानमंत्री न बनने के बाद की स्थिति, तीसरे मोर्चे के सत्ता की वापसी में दिवास्वपन और कांग्रेस पार्टी में प्रियंका गांधी की सक्रियता को अपने लेखों का विषय बना रहे हैं.

ताज़ा रुझानों के मुताबिक़ एनडीए को 220 से 240 के आसपास सीटें मिलने की उम्मीद जताई जा रही हैं. वहीं यूपीए को 120 सीटें मिलने की बात कही जा रही है. लहरों पर सवार भाजपा को यूपी और बिहार में क्षेत्रीय पार्टियों की मौजूदगी से कड़ी टक्कर मिल रही है. इसके मद्देनज़र एनडीए को ज़्यादा सीटों के अनुमान की संभावना से इनकार किया जा रहा है. लेकिन चुनाव बाद होने वाले गठबंधन की गणित पर काफ़ी कुछ निर्भर करेगा कि केंद्र में किसकी सरकार बनेगी और कौन सत्ता में वापसी करेगा? कांग्रेस के सत्ता में वापसी के मनसूबों पर पानी फिरने की बात भी काफ़ी हद तक तय मानी जा रही है. कांग्रेस ज़्यादा से ज़्यादा सीटें लाकर केंद्र सरकार में अपनी भूमिका को महत्वपूर्ण बनाना चाहती है. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तीसरे मोर्चे को समर्थन की किसी भी संभावना से इनकार किया है. इससे तीसरे मोर्चे के नेतृत्व वाली सरकार बनने की संभावना लगभग नगण्य मानी जा रही है. लेकिन राजनीति में वक़्त के साथ समीकरणों के बदलने में देर नहीं लगती, इसलिए अभी से कुछ भी कहना बहुत मुश्किल है.

लोगों का 16 मई का इंतज़ार है. जब वास्तविक नतीज़े सामने होंगे. सारी तस्वीर साफ़-साफ़ दिखाई देगी. जब किसी कयास और लहर की कोई चर्चा के के बजाय राजनीति के वास्तविक समीकरणों पर बात होगी. यूपीए या एनडीए या तीसरा मोर्चा किसकी सरकार बनेगी, आम आदमी पार्टी की भूमिका का विश्लेषण होगा, लालू की राजनीति में वापसी पर चर्चाएं होंगी, समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह को पीएम बनाने वाले सपने का आँकड़ों के आधार पर नापतौल के लम्हे देखने लायक होंगे या यूँ कहें कि काबिल-ए-ग़ौर होंगे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. अभी की स्थिति काफ़ी उलझी हुई है, आर-पार के फ़ैसले का ज्वार लंबे चुनावों में भाटा बनकर समंदर में वापसी कर रहा है. लहरें विश्राम को समय के समंदर में समा रही हैं. नई लहरें सतह की ओर आ रही हैं. इसके साथ-साथ भारतीय राजनीति के समंदर में राजनीति की लहरों के आने-जाने का सिलसिला अनवरत जारी है.

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