सोशल मीडियाः वर्चुअल दुनिया की ट्वीट-ट्वीट..

21वीं शताब्दी में सोशल मीडिया का हमारे जीवन में दख़ल बहुत ज़्यादा बढ़ा है. संवाद के माध्यमों में अंधाधुंध बढ़ोत्तरी हुई. लेकिन इसके ठीक विपरीत अकेलापन,ख़ामोशी, संवादहीनता का विस्तार हुआ है और करीबी दोस्तों की संख्या में तेज़ी से गिरावट भी हुई है.

लोगों के फेसबुक पर हज़ारों दोस्त हो सकते हैं. ट्विटर पर लाखों फॉलोवर हो सकते हैं. लेकिन बड़ी संख्या में दोस्तों के बीच अपनों का अभाव क्यों है? इस सवाल का जवाब खोजना वक़्त की जरूरत है. आइए सोशल मीडिया के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करते हैं.

वर्चुअल दुनिया में सोशल सपोर्ट बेस के साथ-साथ निजी जीवन में सोशल सिस्टम की जरूरत आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है. आज वर्चुअल दुनिया की ट्वीट-ट्वीट के ख़तरों के प्रति सतर्क होने और समाधान खोजने की जरूरत है.

सोशल मीडिया के खतरे

सोशल मीडिया, मीडिया और सूचना विस्फ़ोट की गूँज जीवन में साफ़-साफ़ सुनाई देती है. आप देश के किसी भी कोने में हों, सुबह के अख़बार, कमरे का टेलीविजन और गाँवों में गूँजती रेडियो की आवाज़ सूचनाओं की तरंगों को तेज़ी से प्रसारित करती हैं. एफ़एम की सुविधा के कारण संगीत और मनोरंजक कार्यक्रमों के बीच हर घंटे आने वाले कार्यक्रम लोगों को देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाली घटनाओं से अपडेट रखते हैं. लेकिन इस प्रक्रिया में लोगों के जीवन में इसका दख़ल भी बढ़ता जा रहा है.

हाल ही में सुनंद पुष्कर की अप्राकृतिक और संदिग्ध परिस्थितियों में होने वाली मौत के बाद ट्विटर को लेकर होने वाली चर्चा तेज़ हो गई है. जिस तरह से सारा विवाद ट्विटर से शुरू हुआ. पाकिस्तान की महिला पत्रकार मेहर तरार का नाम सामने आया. सुनंदा ने उनको अपनी शादी-शुदा ज़िंदगी में दख़ल देने और अपने पति का पीछा करने का आरोप लगाया. यह सारा विवाद, सारी बहस सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में हो रही थी. लोगों को अंदाज़ा नहीं था कि वर्चुअल दुनिया की ट्वीट-ट्वीट रिश्तों में दरार डालने और शक पैदा करने वाले काँव-काँव में तब्दील हो जाएगी. पाकिस्तान की महिला पत्रकार के ऊपर आईएसआई का एजेंट होने का आरोप लगा. इससे उन्होंने भारत औऱ पाकिस्तान में अपनी जान को ख़तरा बताया था.

बदलती प्राथमिकताएं

लेकिन घटना से बाद से तनाव का सामना कर रही सुनंदा पुष्कर की शाम में संदिग्ध परिस्थितियों में होने वाली मौत से लोगों को बड़ी हैरानी हुई. उनको यक़ीन नहीं हो रहा था कि यह सच था. लेकिन सच्चाई लोगों के सामने वीभत्स रूप में थी. सुनंदा ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि शशी को ट्विटर और में किसी एक को चुनना हो तो शशी ट्विटर को चुनेंगे. उनका यह जवाब पति-पत्नी के रिश्तों में ट्विटर के दख़ल को सामने लाता है. शशी व्यस्तता के बीच ट्विटर के लिए वक़्त निकाल लेते हैं, लेकिन पत्नी के लिए वक़्त की कमी की बाक साफ़ तौर पर सामने आती है. संवाद के माध्यमों में बढ़ोत्तरी के साथ संवादहीनता भी बढ़ी है.

सेलीब्रेटी और लेखकों को फॉलोवर चाहिए, विवादों का साथ चाहिए, सुनने वाले लोग चाहिए, फ़ेसबुक पर लाइक्स चाहिए, लोगों के कमेंट्स चाहिए और अटेंशन चाहिए. उनकी इस इच्छा और वास्तविक जीवन में साथी, संगिनी और दोस्तों के साथ संवाद का मौका नहीं होता. इससे पीड़ाजनक और तकलीफ वाली स्थिति एक महिला के लिए नहीं हो सकती. यह दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोगों के बीच होने वाले संवाद के बीच अकेले पड़ते इंसान की कहानी है. हक़ीक़त में किसी का साथ नहीं. वास्तविक जीवन में लोगों की व्यस्तता. फुर्सत के पलों में सोशल मीडिया का दख़ल इन सारी परेशानियों को सुनंदा चैनल को दिए साक्षात्कार में स्वीकार करती हैं. उनका कहना था कि सोशल मीडिया पर जाया होने वाले समय को कम करना चाहिए.

अनसुलझे सवाल और समाधान

उनकी प्यार की परिभाषा में साथ होना काफ़ी अहम था. वर्तमान की व्यस्त ज़िंदगी में वक़्त की कमी का साथ. अपनों पर होने वाला संदेह. वर्चुअल दुनिया के होने वाले शाब्दिक हमलों से उपजा तनाव के सामने उनकी ज़िंदगी मौत से पराजित हो गई. लेकिन सवाल ज्यों के त्यों बने हुए हैं, ट्विटर की ट्वीट-ट्वीट, फेसबुक की फुस-फुस और रोजमर्रा की व्यस्तता के बीच अपनों के लिए वक़्त निकालना, फुरसत में बैठकर मतेभदों को दूर करना कितना जरूरी है? संवादहीनता और सार्थक साथ की कमी का विकल्प क्या है? व्यक्तिगत मसलों को सोशल मीडिया पर ले जाना कितना सही है? अपनी व्यक्तिगत परेशानियों को लोगों के साथ साझा करना कितना सही है? ज़िंदगी में करीबी लोगों का होना कितना जरूरी है?

संवाद के माध्यमों के साथ बढ़ी संवादहीनता का समाधान भी बातचीत है. वक़्त की कमी का सवाल काफ़ी अहम है. कुछ समस्याओं का तत्काल समाधान (रियल टाइम)करने की जरूरत होती है. इसके लिए लोगों से सीधे फोन पर संवाद करना, लोगों से मेल लिखकर बात करना, फ़ेसबुक पर चैट करना बेहतर विकल्प हो सकता है. फ़ोन पर मैसेज करने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है. लेकिन अपने काम, जिम्मेदारियों के बीच फंसे लोगों का अपने दोस्तों से लंबे समय तक बात नहीं हो पाती. इस कारण से उनको अपनी बात कहने की जरूरत के समय उनकी याद नहीं आती,., वो लगभग दिमाग से उतर चुके होते हैं. ऐसे माहौल में अधिकांश करीबी दोस्तों से निरतंर संवाद बनाए रखना,. उनसे बात करते रहना काफ़ी मददगार हो सकता है.

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