भारत एक कृषि प्रधान देश है!!!


भारत एक कृषि प्रधान देश है. यहां की जनता को से सरकार सस्ता अनाज मुहैया कराएगी. जो काम यहां के किसान, हरित क्रांति के बाद भी पैदावार बढ़ाकर नहीं कर पाए. उसका श्रेय अब सरकार को मिलने वाला है. क्योंकि सरकार के पास सड़ते हुए अनाज को रखने के लिए जगह नहीं है. उसे पहले भी सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि अगर अनाज रखने की पर्याप्त जगह नहीं है तो इसको गरीबों में क्यों नहीं बांट देते? 

फटकार की राह पर सरकार
इस खाद्य सुरक्षा क़ानून की बिंडबना यही है कि खाद्यान सुरक्षा के पुख़्ता उपाय किए बिना कैसे कोई सरकार लोगों को अनाज उपलब्ध करवा देने की बात कह रही है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियों के सुधारने के तमाम काम अभी ठंढे बस्ते में पड़े हैं. 

भारत में अनाज की बर्बादी देखने लायक है. सरकार को सुप्रीम कोर्ट की फटकार मिलती है. मामला संसद तक जाता है. लेकिन तब भी सरकार को भंडारण की चिंता नहीं है. उसे इस बात की फिक्र खाए जा रही है कि लोगों को एक-दो रुपए किलो में दिया जा सके. अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक एक व्यक्ति को हर महीने पांच किलो अनाज मिलेगा, अगर वह पात्रता की शर्तें पूरा करता है.
सरकार अपनी कमियों को ढंकने के लिए घोटालों और भ्रष्टाचार जैसे मामलों से लोगों का ध्यान बंटाने के लिए विधेयक ला रही है. इसे राष्ट्रपति का अनुमोदन मिल चुका है. भारत में अनाज उत्पादन के अनुपात में भंडारण की सुविधाओं का घोर अभाव है. अभी सरकार भंडारण के लिए निजी भंडारगृहों की मदद लेती है. अपने भंडारण की सुविधा को बेहतर करने के लिए सरकार की तरफ से होने वाले प्रयास बहुत धीमे हैं. 2001 से अर्थशास्त्र की किताबों के माध्यम से लोगों को जागरुक किया जा रही है कि प्रतिवर्ष भंडारण की सुविधाओं के पर्याप्त व्यस्था के अभाव में इतने टन अनाज बरबाद हो जाता है. अभी 2013 चल रहा है.

पंचवर्षीय योजनाओं की खिचड़ी 

दो पंचवर्षीय योजनाओं का समय बीत चुका है. लेकिन यथास्थिति में परिवर्तन के आसार नहीं दिखाई पड़ते हैं. पंचायतों को मजबूत करने की बात होती है. उसका खाका बनता है. अगर नरेगा के तहत होने वाले कामों में गांव स्तर पर भंडारण के लिए बजट आवंटन के करके सरकार काम करती तो किसान अपना अनाज सस्ते दामों में बेचकर बाज़ार से मंहगी चीज़ें खरीदने को मज़बूर न होते. जिले स्तर पर एफसीआई के गोदाम हैं. लेकिन बिजली के अभाव में विकास के लिए होने वाली तमाम दौड़ में योजनाएं हाफने लगती हैं. .यही हाल भंडारण की अव्यवस्था का है. जिसकी अव्यवस्था के चर्चे दिल्ली के नरेला मंडी से लेकर संसद तक होता है. लेकिन उसके बाद मुद्दे पर मौन साथ लिया जाता है. हर साल यही कहानी दोहराई जाती है.

गांव से ख़बरें आती है कि किसानों ने खेत से आलू खोदने की बज़ाय सड़ने के लिए छोड़ दिया. खोदने के काम में लगने वाले श्रम की लागत के कारण वे घाटे में जा रहे थे. बाद में उसी फसल के बचे हिस्सों को लाभ और मुनाफे के साथ बेचा जाता है. विदेशों से अनाज आयात करने के मामले में सरकार की पहले भी किरकिरी हो चुकी है. देश के लोगों को जो पैसा मिलना चाहिए, वही पैसा हमारे यहां से अनाज खरीदकर भंडारण करने वाली कंपनियों को मिलता है. अगर अनाज की कीमत बढ़ रही होती है तो सरकार आयात करके सस्ता करने की कोशिशें करती हैं. इतने सारी अव्यवस्थाओं के बावजूद देश की बड़ी जनसंख्या भूखे सोने को मजबूर है. यह बात सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले बार-बार कहते हैं. किसानों के आत्महत्या की ख़बरें आती हैं.

सस्ता अनाज सबके हित में?

लेकिन अनाज़ को सस्ते में उपलब्ध कराना कितना सही है? उत्तराखंड में गुप्तकाशी के गांवों में लोग आज भी डंडे से पीटकर गेहूं निकालते हैं.उतनी ऊंचाई तक थ्रेसर जैसी सहज तकनीक का पहुंचना भी आसान नहीं है. वहां के लोगों के द्वारा पैदा किए गए गेहूं और मैदानी इलाके में आसानी के साथ उगाए गए गेहूं की क़ीमत एक बराबर हो सकती है क्या? लेकिन बाज़ार के मांग-पूर्ति के नियमों के हिसाब से जो सस्ता होगा, उसकी मांग होती है. जो अनाज बेचकर अपनी रोज़मर्रा की जरुरते ंपूरा करते हैं, उनके लिए तो बाज़ार की डगर भी कठिन होने वाली है. अगर लोगों को सस्ता अनाज़ मिलता है तो  बाज़ार में अनाज़ की क़ीमतों पर क्या असर पड़ेगा, सामान्य सी बात हो सकती है कि उनकी क़ीमतों में गिरावट हो सकती है. लेकिन इसका क्या व्यापक प्रभाव पड़ेगा? उसके बारे में कोई विचार नहीं हो रही है.

अनाज़ की गुणवत्ता का सवाल ज़्यों का त्यों बना हुआ है. अनाज़ की गुणवत्ता के बारे में चुप्पी है. अगर लोग सरकारी अनाज़ बाज़ार में बेचने को जाते हैं तो क्या होगा? हो सकता है कि कुछ लोगों को लगे कि सस्ता अनाज़ बेचकर बाज़ार से अच्छी क़ीमत वाला कोई चावल और आटे का पैकेट लेकर आते हैं. इसकी व्यावहारिक दिक्कतों के बारे में तो अध्यादेश के कानून बनने और संसद से पारित होने के बाद ही पता चलेगा. लेकिन इसके राजनीतिक फ़ैसला होने के सवाल से इंक़ार नहीं है. अगर सरकार इस विधेयक को लाना ही चाहती थी तो साल भर पहले लेकर आती. उसको लागू करती. उसकी कमियों में सुधार करती. गरीबी हटाओ के बाद भूख मिटाओ के नारे के साथ सरकार हाज़िर है.

गरीबी हटाओ और भूख मिटाओ

गरीबी हटाओ के बाद भूख मिटाओ के लोकलुभावन नारे के साथ सरकार फिर से वोटों की राजनीति कर रही है. गरीबी तो हटी नहीं, तो अपने काबिल अर्थशास्त्रियों से गरीबी की परिभाषा को बदलने की कोशिश करती रही. गरीबी की कितनी परिभाषाएं हैं, अधिकांश लोगों को पता नहीं है. गरीब किसे कहा जाय, यही तय करने के लिए सरकार तमाम पैमाने अपना रही है ताकि गरीबों के आंकड़ों को कम करके दिखाया जा सके. उस कोशिश में पता नहीं सरकार को कितनी सफलता मिली है, लेकिन लोगों का ऐसी परिभाषाओं से भरोसा टूट गया है.

गरीबी की परिभाषा में तमाम प्रयोगों के बाद सरकार भूख मिटाने की कोशिशें कर रही हैं. सरकार को अब भूख की परिभाषा बनानी होगी कि इतना चावल, गेंहूं आदमी को मिल जाय तो भूखा नहीं रहेगा. खुद भी चैन से सोएगा और वोट देकर हमें भी पांच साल चैन से सोने देगा. लोगों को अनाज़ देने के विचार से अपना विरोध नहीं है. इसके बारे में तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि अगर अनाज़ को खुले में सड़ाने से सरकार बचान नहीं सकती तो गरीबों में बांट दे. इसे उसी दिशा में बढ़ता हुआ कदम माना जा सकता है. लेकिन केवल चावल और गेहूं देने से क्या होगा? लगता है सरकार सोच रही है कि नमक, तेल, सब्जी का इंतज़ाम नरेगा से हो जाएगा. नरेगा की पूरक योजना के रुप में लागू करने का ख़्याली पुलाव तो अच्छा है.

लेकिन लोगों की स्थिति को बेहतर करने के बज़ाय, रीढ़ कमज़ोर करने के विकल्पों से मानव संसाधन की स्थिति और बिगड़ेगी. अभी नरेगा के नाम पर गांव के मेहनतकश मज़दूरों में कामचोरी का रोग फैल रहा है. वे नेताओं के पीछ खलिहर घूम रहे हैं ताकि बिना काम किए पैसे मिल जाएं. गांव में खेती की मज़दूरी की दरें बढ़ गईं, जिससे खेती करने वाले लोगों को दिक्कत हो रही है. सरकार तो डीजल का दाम बढ़ा रही है. बीजों का नियंत्रण तो किसानों के हाथ से जा चुका है. उनके तमाम देशी बीजों का अस्तित्व मिट चुका है. उन्नतशील बीजों के फेर में किसान हर साल नया और मंहगा बीज लेने को मजबूर हैं. ऊपर से भारी बारिश और सूखे के भय का सामना तो किसानों को आए दिन करना पड़ता है.

निष्कर्ष क्या है?
अल्पकालिक राहत की योजना के रुप में खाद्य सुरक्षा अधिनियम की दवा काम आ सकती है. लेकिन इस इलाज के साइड इफेक्ट पर कोई ध्यान नहीं है. खेती पर निर्भर रहने वालों के लिए मुश्किलें बढ़ने वाली हैं. अभी खेती से लोगों का बड़े स्तर पर पलायन हो रहा है. खेती योग्य ज़मीन घट रही है. पंजाब में जमीनों की उत्पादकता घट रही है. भूजल का स्तर नीचे जा रहा है.

रासायनिक खादों और कीटनाशकों के कारण तमाम तरह के दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं. सब्जियों में इंजेक्शन लगाने की चर्चा हो रही है. नकली दूध का मामला न्यायालय तक पहुंच रहा है. सारी स्थितियां कृषि के क्षेत्र में ध्यान देने की जरुरत की तरफ हमारा ध्यान खींचती हैं. लेकिन सरकार अभी खेती से निकले अनाज के बारे में सोच रही हैं. जब तक खेती और किसानों की स्थिति के बारे में नहीं सोचा जाता. अल्पकालीन उपायों से बड़े और क्रांतिकारी बदलाव की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

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3 comments

  1. ऐसी फटकार से अगर सरकार सुधर जाए तो कोई समस्या ही न रहेगी . अब तो कोई भी मुद्दा बड़ा आन्दोलन की मांग करता है.

  2. ऐसी फटकार से अगर सरकार सुधर जाए तो कोई समस्या ही न रहेगी . अब तो कोई भी मुद्दा बड़ा आन्दोलन की मांग करता है.

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