लिखने की तैयारी कैसे……

लिखने के लिए योजनाएं बनाने में काफी समय बीत जाता है। लिखने का काम अधूरा रह जाता है। इसीलिए कुछ लोग कहते हैं कि लिखने के लिए मन बनाने में ज्यादा समय न लेकर लिखना शुरू करना बेहतर होता है।जब तक लिखने की पहल नहीं होती, चिंतन चालू रहता है। लिखने का काम रुका रहता है। लेखन और चिंतन का साथ-साथ चलना ही बेहतर है।  बजाए इसके कि सिर्फ चिंतन चलता रहे। हमारे लिखने का कोई समय निश्चित हो तो अच्छा होता है। इससे हमें लिखने की तैयारी में ज्यादा वक़्त जाया नहीं करना पड़ता । 
लिखने का समय हर किसी के लिए अपनी सहूलियत के अनुसार निश्चित हो सकता है। किसी को सुबह लिखना अच्छा लगता है। तो किसी को शाम को तो कोई-कोई कभी भी फुरसत के लम्हों में लिखने का काम करता है। सबसे खास बात कि लिखना जिनका प्रोफेशन हो, उनको तो लिखने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। विचारों को लिपिबद्ध करते रहने से लिखने के समय रफ़्तार काफी तेज होती है। हमें भूमिका बनाने के लिए सामग्री भी आसानी से मिल जाती है। जिसके पुर्नलेखन और मामूली फेरबदल से लिखने के सफर को आगे बढ़ाया जा सकता है। 
रचनात्मक लेखन के लिए लोग इंटरनेट से अलग रहने की सलाह देते हैं। ध्यान देने वाली बात है कि लिखते समय एकाग्रता की मौजूदगी बाकी बाधाओं पर पार पा लेती है। लिखते समय कई विचारों के साथ संवाद से लिखने का प्रवाह प्रभावित होता है। अगर हम कोई पैराग्राफ लिखते समय बीच में उठकर कोई काम करने और किसी से बात करने में मशगूल हो जाते हैं तो वापस लौटकर उस कड़ी को दोबारा खोजना कठिन हो जाता है। लगातार लिखने के क्रम में एक श्रृंखला सी बनती जाती है। जो एक बार टूटने पर मुश्किल से जुड़ती है। 
सतत अभ्यास के माध्यम से विचारों के क्रम को व्यवस्थित करनें। भूमिका, विस्तार व अंतिम पैराग्राफ लिखने की कला सीखी जा सकती है। लिखने के लिए लगातार पढ़ते रहने की जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। हम लिखने की प्रक्रिया में शब्दों के इस्तेमाल का हुनर सीखते हैं। पढ़ने की प्रक्रिया में शब्द भंडार में इज़ाफा करते हैं। शब्दों की संपन्नता विचारों को सटीक तरीके से कहने में मददगार होती है। लिखने का एक फार्मूल है कि वही लिखना जिससे हम जुड़ाव महसूस करते हों। इससे बाकी लोग हमारे लेखन से जुड़ते हैं। 
जिस विचार से हम इत्तेफाक रखते हैं। उस पर लिखने के लिए हमें शब्दों की तलाश में उलझना नहीं पड़ता। विषय का फैसला होने के बाद शब्दों का सिलसिला अपने आप बनता चला जाता है। मन की बात शब्दों में ढलकर पन्नों पर विखरने लगती है। लिखने के दौरान विचारों को व्यवस्थित करना जरूरी है। इसके लिए हर किसी की अपनी स्टाइल हो सकती है। हमें अपनी शैली विकसित करनी चाहिए। ताकि हम अपनी बात को व्यवस्थित तरीके से कह सकें। लिखने से पहले जो आप लिखने वाले हैं उसकी रूपरेखा बना लेना जरूरी है।
 जो हम कहना चाहते हैं, वह हमारे मन में जितना स्पष्ट होगा, हमारे लेखन में भी उसकी स्पष्टता भी साफ-साफ दिखाई पड़ती है। कोई विचार मन में कौंधता है। लिखते-लिखते विचार की कटाई-छंटाई होती रहती है। हो सकता है कि हम जिस निष्कर्ष पर जाने वाले थे। उससे कोई अलग निष्कर्ष भी निकल सकता है। लेकिन रूपरेखा बनाने से लिखने की प्रक्रिया में भटकाव की गुंजाइश कम हो जाती है। मन में जो भी बात आ रही हो। शीघ्रता के साथ उसे लिखना बहुत जरूरी है। यह विचारों को लिपिबद्ध करने का बेहतर तरीका है। इससे मुख्य बिंदुओं को चिन्हित करने में मदद मिलती है। जिसके आसपास विचार करते हुए, फिर आगे लिखे हुए को विकसित किया जा सकता है। 
लिखते समय कोई फैसला मत कीजिए कि खराब लिख रहे हैं, बेहतर लिख रहे हैं, बस लिख डालिए। लिखने का काम पूरी होने के बाद लिखे हुए को फिर से देखते हुए, पहले से लिखे हुए को बेहतर बनाने का काम किया जा सकता है। लिखे हुए को दोबारा पढ़ना, बोलकर पढ़ना, गलतियों को बारीकी से देखना। लिखे हुए को किसी दोस्त से साझा करना लिखे हुए को और बेहतर बनाने में काफी मददगाक हो सकता है। अपने लिखे हुए को दोबारा पढ़ने ा अभ्यास लेखन की गुणवत्ता को बढ़ाने मे ंनिःसंदेङ सहायका होता है।
लिखने के बारे में पढ़ने के बाद लगता है कि लिखने के बारे में काफी कुछ लिखा जा सकता है। लेकिन हाल फिलहाल इतना ही बाकी फिर लिखते हैं।
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