गाँव से शहरों की ओर पलायन भी है विकास का सूचक

आजकल गाँव से शहरों की तरफ होने वाले पलायन को रोकने के लिए कई तरह के तर्क गढ़े जा रहे हैं। इस पूरी कवायद का एक ही मकसद है कि शहरों में आने वाली वाली ग्रामीण आबादी को कैसे रोका जाए। इसके लिए हमारे समाज के बुद्धिजीवियों के साथ -साथ सरकार भी अपनी भूमिका का सक्रियता से निर्वहन कर रही है। सरकारी योजना के तहत गाँवों में शहरी सुविधाओं के विकास का प्रावधान किया जा रहा है। ताकि गाँवों की जनता गाँवों में रहे और शहरों की तरफ सैर-सपाटे, शिक्षा ,रोजगार के मकसद से न पहुंचे।
मेरे कई मित्र समाज कार्य विषय के अध्ययन-अध्यापन के कार्यों से जुड़े हुए हैं। उनसे जब भी भेंट मुलाक़ात का मौका मिलता है तो कई सारे मुद्दों पर चर्चा हो जाती है। एक मुलाकात के दौरान इस योजना का जिक्र हो आया। चर्चा p u r a के फुल फार्म से शुरू हुई थी। मेर मित्र अपने दुसरे सहपाठी को इसका सही फुल फॉर्म बता रहे थे की बीच में मैंने दखल कर दिया। और इस फुल फॉर्म को पलट दिया और ये पूरा यानि पीयूआरए हो गया P R U.  जिसका अर्थ हो गया की शहरों में ग्रामीण सुविधाओं का विकास किया जाए।
फिर तो बात-चीत एक दुसरे दिशा में मुड़ी और फिर एक नई बहस शुरू हो गयी । अब बात यह होने लगी कि गाँवों से पलायन रोकने के लिए चल रही इस योजना को और बेहतर कैसे बनाया जाए। इसके लिए तमाम तरह के सुझाव आने लगे और एक शोध परियोजना का भी जिक्र हो आया की एसी में बैठकर बनाई गयी योजनाओं से गाँवों के लोगों का भला नही किया हो सकता।
इसलिए एक अध्ययन किया जाए जिसमे यह निश्चित किया जाए की , शहरों में लम्बे समय से रह रही आबादी को गाँवों में भेजा जाए और उनके व्यवहार का अध्ययन किया जाए की उनको किस तरह की मानसिक,शारीरिक,वैचारिक और सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस तरह के शोधों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त संस्था के माध्यम से संचालित किया जाए।
इसके निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए गावों के लिए सरकार द्वारा संचालित योजना में समाहित किया जाए। इस बात का विशेष तौर पर ध्यान रखा जाए की यह शोध परियोजना लम्बे समय की हो और इसके लिए आधुनिक शहरी परिवारों को ही अध्ययन की इकाई के बतौर चुना जाए। इससे प्राप्त होने वाले निष्कर्ष हकीकत के ज्यादा करीब होंगे।
प्रमुख मुद्दे पर बात करना तो अभी बाक़ी ही है, की शहरों से गाँवों की तरफ पलायन कैसे विकास का सूचक है। विकास का सूचक इस मायने में जैसे देश जब गुलाम था तो लोग ब्रिटेन जाते थे , कानून और बिभिन्न विषयों की पढाई करने,तो इसको सकारात्मक सन्दर्भों में ही देखा जाता था।

भारत में आधुनिकता की रौशनी भी वहीं से आई,चाहे राजा राम मोहन रॉय का जिक्र हो, यह नेहरु यह फिर गांधी का जिन्होंने भारत की यात्रा के बाद यहाँ के मूल को समझा और अपनी अंग्रेजियत से उबरे और लोगों के साथ लोगों के हक़ में खड़े हुए।

उसी तरह से अगर गाँव का कोई लड़का वहां से शहर में अध्ययन के लिए आता है। वह भी काफी कुछ नया सिखाता है और ए जान सकता है की गाँव में जिन हालातों में लोग जी रहे है,उससे बाहर की दुनिया उनसे कई साल आगे का जीवन जी रही है।

उन्हें भी अगर तरक्की के साथ अपने कदम आगे बढ़ने हैं तो अपने बच्चों को शहर भेजना होगा, ताकि वो पढ़े और आगे बढ़ने के साथ ही बाक़ी लोगों को आगे बढाने में सहायक बन सके।शहर में बैठा कोई गावं का रहने वाला ही इस मुद्दे पर इतनी संवेदनशीलता से सोच सकता है। गाँव की प्राथमिक पाठशाला पर लिखे इन आधुनिक विचारों की सच्चाई किससे छुपी  है>
जब गाँव में मिले रोजगार
तो शहर में जाना है बेकार ।
पता नहीं इस सुन्दर कथन का रचनाकार कौन है,जिसने अपनी रचनात्मकता से इन अल्फाजों को एक दोहे के रूप में पिरोया है। इसमें राष्ट्रवाद,क्षेत्रवाद ,के साथ ही भेद-भाववाद भी कूट-कूट कर भरा है। हमारे एक मित्र का कहना जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी शहरों में बिताई है। अभी तक सिर्फ एक दो बार गाँव गए हैं । उनका कहना है की इसको और बेहतर बनाया जा सकता है । जैसे :        जब देश में मिले रोजगार
                               तो तो परदेश जाना है बेकार।
पर इससे तो मूल प्रश्न तो वही का वही रहता है की आखिर क्या सबको गाँव में स्तरीय रोजगार दिलाया जा सकता। जो कुछ पढ़ा लिखा है वो तो नरेगा में काम करेगा नही , वो भी १०० दिन के लिए । मान लिया की कोई शिक्षित युवक नरेगा में काम करने को तैयार भी हो जाता है तो क्या अंजाम होगा। तीन महीने के बाद घर वालों के ताने सुनकर उसका बुरा हाल हो जाएगा।
इसकी पढाई में लगाए गए पैसे तो डूब गए, उससे अगर खेत की जुताई , खाद और सिंचाई पर खर्च किये होते तो ज्यादा बेहतर होता। उन्हें उतना ही दुःख होता है जैसे किसी निवेशक को शेयर बाजार में लगाए गए पैसों के डूब जाने के कारण अवसाद और दुःख का सामना करना पड़ता है।
आखिर गाँवों के लोग अपनी कितनी खुशियों को कुर्बान कर देते हैं, अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए। इसका हिसाब कौन देगा ? और उनकी बात कौन करेगा जिनकी नियति में रामू बनना लिख दिया गया।तो गावों से शहरों की तरफ पलायन को भी बेहतरी की तलाश ही कहा जाना चाहिए। जो जागरुकता, प्रगति और सम्पन्नता को अपने गावों तक लाने के लिए है।

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